मारधाड़, नृत्य-संगीत, मिलना-बिछुड़ना और दोस्ती-दुश्मनी को सर्वोपरि रखकर चलने वाले फिल्मकारों के लिए सदानीरा गंगा हमेशा एक ऐसी अविरल धारा का काम करती रही है, जिसने सिनेमा के इतिहास में अपना सानी नहीं रखा है। गंगोत्री से निकलकर गंगासागर में मिलने वाली गंगा जिस तरह से शहरों में घूमती हुई कभी निर्मल तो कभी मैली होकर बहती है ठीक उसी तरह से फिल्मकारों ने गंगा को पवित्रता का सागर बताते हुए इस स्थिति में ले जाकर छोड़ा है- जहां पर पहाड़, पेड़, जंगल, नदियों के किनारे-मझधार में प्रेमी युगल के रूप में अभिनेता-अभिनेत्री यही गाते मिलते हैं- राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते और कभी वह गाते हैं गंगा घाट का पानी पिया है अब सबको पिला दूंगा।
प्रयागराज में गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर माघी मेला परवान पर है और आस्था की त्रिवेणी में आस्थावान डुबकी लगा रहे हैं। प्रयागराज ही क्यों, दूसरे ऐसे स्थान जहां पर गंगा की धारा है वहां पर भी गंगा मां को आचमन करने के लिए आम जन लालायित हैं। और हां, यहां पर गंगा की धारा के साथ ही गंगा भक्ति की भी धारा बह रही है। यह भक्ति फिल्मी गीतों के रूप में है। माताओं-बहनों के समवेत स्वर, अकेले में मस्त स्नान के बाद घूमता युवा और उम्र के परिपक्व पड़ाव पर पहुंच चुके हमारे बुजुर्ग बस गंगा गीतों की भक्ति में रमे हैं।
हिंदी फिल्मों में गंगा और उसके महत्व को दर्शाने के लिए दर्जनों फिल्में बनी हैं। कई फिल्में ऐसी हैं जो गंगा पर बनी नहीं हैं पर उनमें गंगा के गीत होने से उनकी आत्मा गंगा से मिल गई है। उत्तर भारत हो या दक्षिण हो या फिर देश का दूसरा स्थान हर कहीं गंगा गीतों ने धूम मचाई है। असम में भूपेन हजारिका ने गंगा को जीया है तो भोजपुरी में में गंगा मइया के गुण बखाने गए हैं। जहां तक फिल्मों की बात है तो गंगा की सौगंध, गंगा-यमुना, गंगा और गौरी, राम तेरी गंगा मैली, गीत गंगा, जिस देश में गंगा बहती है, जिस देश में गंगा रहता है, गंगा की लहरें, गंगा तेरा पानी अमृत तथा शिवगंगा आदि फिल्में हैं।
जितनी गंगा पर फिल्में बनी हैं उससे कहीं अधिक उसका महत्व दर्शाते गीत हैं। सही बात तो यह है कि गंगा के आकर्षण ने पूरी मूवी इंड्रस्ट्री को अपने मोहपाश में जकड़ रखा है। हमारे सांस्कृतिक मूल्य, आपसी संबंध, दुख-सुख, मोहब्बत के रंगों से गीत भरे पड़े हैं। खास बात यह कि गंगा जब गंगोत्री से निकलती है तो गंगासागर में जाकर मिलती है। पर बनारस, प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश तथा गंगासागर को ही फिल्मकारों ने अधिकतम सुनहरे पर्दे पर उकेरा है। गीतों-फिल्मों में शहरों की छाप साफ नजर आती है। विस्तार में न जाते हुए यह कहा जा सकता है कि फिल्मी गीत देख-सुनकर पता चलता हे कि गंगा हमारे जीवन में कितना महत्व रखती है।
फिल्म सुहागरात का लता मंगेशकर का गया गीत “गंगा मइया में जब तक पानी रहे, मेरे सजना तेरी जिंदगानी रहे...” आज तक गंगा और स्त्री सुहाग के प्रेम का प्रतीक बना हुआ है। किसी भी घाट पर चले जाएं वहां आपको यह गीत सुनाई न दे, यह नहीं हो सकता। यूं इसे सुहाग पर्व करवा चौथ से जोड़कर देखा जाता है और हर करवा चौथ या दूसरी अन्य चौथ जिन पर सुहागिन व्रत करती हैं, गुनगुनाती नजर आती हैं। दूसरा गीत भी लता मंगेशकर का गाया हुआ ही है-फिल्म गंगा की सौगंध का यह गीत, “मानो तो मैं गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी” के स्वरों को इस तरह से हमें आनंदित करता है कि लगता है हम अपनी मां जिसने हमें जन्म दिया है की गुनगुनाहट सुन रहे हैं।
शो मैन राजकपूर एक ऐसे निर्माता-निर्देशक-अभिनेता हैं जिन्होंने गंगा और उसकी अस्मिता को लेकर दो फिल्में बनाई। पहली फिल्म थी, जिस देश में गंगा बहती है। इसका गीत “होठों पर सच्चाई रहती है, जहां दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है” ने मानवीय स्वभाव और मानव के उन उसूलों का बताया जो हमारे सनातन काल से खून में समाए हैं। उसके बाद उन्होंने राम तेरी गंगा मैली हो गई बनाई जो गंगा रूपी स्त्री अर्थात मां को किस तरह से कुछ पापी अपवित्र करते हैं पर पूरा फोकस है। इसके दो गीतों ने तो गंगा को हमारे दिलों में गहरे उतार दिया। “राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते-धोते और तुझे बुलाएं ये मेरी बाहें, सी गंगा फिर न मिलेगी” दोनों ही संगीत के स्वरों को जिस तरह से अंतर्मन तक झकझोरते हैं वह मां गंगा की हमारे जीवन में भूमिका के रंग दिखाते हैं।
राजकपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है के बाद गोविन्दा तथा सोनाली के साथ एक मूवी और आयी थी जिसका नाम था जिस देश में गंगा रहता है। इसका गीत “जिस देश में गंगा रहता है…” भी गंगा की धारा का बखान करता है। गीत गंगा सन 1982 में आयी। जरीना बहाव और अरुण गोविल की अदाकारी में इसमें भी गंगा को जीवन से ऊपर माना है। “जब तक सांस है मैं गाऊंगा, सुनाऊंगा गीत गंगा का” सुरेश वाडकर ने बहुत ही मन से गाया है। 1964 की गंगा की लहरें तो एक मस्त मूवी रही। अल्हड़-मस्त किशोर कुमार का स्वरबद्ध गीत “मचलती हुई, हवा में छम-छम, हमारे संग चलें गंगा की लहरें” सच में लहरों की मस्ती में डूबों देती हैं। और मोहम्मद रफी फिल्म गंगा तेरा पानी अमृत का टाइटल सॉग “गंगा तेरा पानी अमृत, झर -झर बहता जाए, जुग-जुग इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए...” जब सुनते हैं तो पता चलता है कि वास्तव में गंगा ही है जिससे हमें जीवन मिलता है। भला कौन भूल सकता है राजा भागीरथ को जिन्होंने शिव की जटाओं में मां गंगा को बंधवाकर धरती पर अमृत प्रवाह कराया और अपने पुरखों को शाप से मुक्ति दिलाई।
कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जिनमें गंगा को दूसरे तरीके से पेश किया गया है। पौंगा पंडित में रणधीर कपूर पर पिक्चराइज गीत “गंगा घाट का पानी पिया है अब सबको पानी पिला दूंगा…” एक खिलंदड़ मस्ती का समां पैदा करता है। अपने रंग हजार में तो गंगा की आड़ में बहुत ही मस्त गीत बना है। “गंगा में डूबा, न जमना में डूबा, डूब गया मेरा मन सजना तेरी दो अंखियन में”, संजीव कुमार तथा लीना चंद्रावरकर की कैमिस्ट्री दर्शकों को रोमांटिक कर देती है। जीवनधारा में तो किशोर दा ने “गंगाराम कंवारा रह गया...” गाते हुए न सिर्फ बच्चों का मनोरंजन किया बल्कि यह भी बताया कि नाम में कुछ नहीं है बस खिलंदड़ी आनी चाहिए।
गंगा पर हिंदी का अधिकार है ऐसा नहीं है। भारत रत्न तथा दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित भूपेन्द्र हजारिका ने तो गंगा की पवित्रता पर इतना महत्वपूर्ण तरीके से गाया है कि आज तक उसका जोड़ीदार गीत नहीं बना। वे गाते हैं, “विस्तार है अपार, प्रजा दोनों पार, करे हाहाकार निःशब्द सदा, ओ गंगा तुम ओ गंगा बहती हो क्यों? नैतिकता नष्ट हुई, मानवता नष्ट हुई, निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यूं?” अगर पूरा गीत सुनें तो मन शर्म से झुक जाता है गंगा और समाज की पीड़ा को सुनकर और भोजपुरी ने तो गंगा मां के सम्मान में जो झंडे गाड़े हैं वह आज तक लहरा रहे हैं। भोजपुरी फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढईबों का टाइटल सॉग लता मंगेशकर ने जिस तन्मयता से गाया है वह हमारी आत्मा को झंकृत कर जाता है। गीत है “हे गंगा मईया तोहे पियरी चढईबो, सइयां से करी दे मिलनवा हाय राम, गंगा नहाई सूरज पइयां लागि आयीं मांग आई एक मांगनवा हो राम।ठ जब हम गंगा का इतना बखान पर्दे पर देख सकते हैं तो सोचिए गंगा स्नान के बाद मन कितना निर्मल हो जाएगा।